उत्तर प्रदेश में जिलों के नाम बदलने की राजनीति एक बार फिर सुर्खियों में है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम फिर से संत रविदास नगर करने की घोषणा की है. इस ऐलान के बाद एक बार फिर यह चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर पिछले 3 दशकों में किन-किन सरकारों ने जिलों के नाम बदले और इसके पीछे उनकी क्या राजनीतिक और वैचारिक सोच रही?
उत्तर प्रदेश में जिलों के नाम बदलने का सिलसिला नया नहीं है. अब तक अलग-अलग सरकारों ने कई जिलों के नाम बदले हैं. कभी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को आधार बनाया गया, तो कभी सामाजिक न्याय और महापुरुषों के सम्मान को. यही वजह है कि सत्ता परिवर्तन के साथ कई बार पहले की सरकारों के फैसले भी बदल दिए गए.
मायावती सरकार में सबसे ज्यादा बदले नाम
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती के चार कार्यकाल रहे, लेकिन वर्ष 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद उन्होंने बड़े पैमाने पर प्रशासनिक फैसले लिए. इसी दौरान वर्ष 2010 और 2011 में उत्तर प्रदेश के 9 जिलों के नाम बदल दिए गए.
तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की अगुवाई वाली बसपा सरकार का कहना था कि जिन महापुरुषों ने दलित, पिछड़े और वंचित समाज के उत्थान में योगदान दिया, उनके नाम पर जिलों का नामकरण कर उन्हें उचित सम्मान दिया जाना चाहिए. इसके तहत कई जिलों को नए नाम दिए गए. बसपा सरकार में अमेठी का नाम बदलकर छत्रपति शाहूजी महाराज नगर, कानपुर देहात का नाम रमाबाई नगर, कासगंज का नाम कांशीराम नगर, अमरोहा का नाम ज्योतिबा फुले नगर, हाथरस का नाम महामाया नगर, हापुड़ का नाम पंचशील नगर, शामली का नाम प्रबुद्ध नगर, संभल का नाम भीमनगर और भदोही का नाम संत रविदास नगर कर दिया गया।
इनमें कांशीराम, महात्मा ज्योतिबा फुले, माता रमाबाई, संत रविदास, छत्रपति शाहूजी महाराज और भगवान बुद्ध के पंचशील सिद्धांत जैसे प्रतीकों को महत्व दिया गया. बसपा ने इसे सामाजिक न्याय और बहुजन महापुरुषों को सम्मान देने की दिशा में बड़ा कदम बताया था.
सत्ता बदली तो बदल गए नाम
मार्च 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मायावती सरकार के नाम बदलने के फैसले को पूरी तरह पलट कर रख दिया. तत्कालीन सपा सरकार का तर्क था कि जिन जिलों के नाम बदले गए थे, उनके पुराने नाम जनता के बीच अधिक प्रचलित थे और नए नामों से प्रशासनिक स्तर पर भी भ्रम की स्थिति बन रही थी.
इसके बाद अखिलेश सरकार ने सभी नौ जिलों के नाम फिर से पुराने नामों में बदल दिए.
छत्रपति शाहूजी महाराज नगर का नाम बदलकर अमेठी, रमाबाई नगर का नाम बदलकर कानपुर देहात, कांशीराम नगर का नाम बदलकर कासगंज, ज्योतिबा फुले नगर का नाम बदलकर अमरोहा, महामाया नगर का नाम बदलकर हाथरस, पंचशील नगर का नाम बदलकर हापुड़, प्रबुद्ध नगर का नाम बदलकर शामली, भीमनगर का नाम बदलकर संभल और संत रविदास नगर का नाम बदलकर भदोही कर दिया गया.
समाजवादी पार्टी की सरकार ने उस समय कहा था कि जिलों की ऐतिहासिक पहचान और स्थानीय लोगों की भावनाओं को देखते हुए पुराने नामों को बहाल किया जा रहा है. वहीं बसपा ने इस फैसले को दलित महापुरुषों का अपमान बताते हुए विरोध किया था.
बीजेपी सरकार में बदले दो बड़े जिलों के नाम
साल 2017 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद नाम बदलने की राजनीति ने नया रूप लिया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार ने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले स्थानों के नाम बदलने पर जोर दिया.
सबसे पहले 16 अक्टूबर 2018 को इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किया गया. सरकार का कहना था कि प्रयागराज इस शहर का प्राचीन और ऐतिहासिक नाम है तथा कुंभ और संगम की पहचान इसी नाम से जुड़ी रही है.
इसके बाद 6 नवंबर 2018 को फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया. सरकार ने इसे भगवान श्रीराम की जन्मभूमि की पहचान से जोड़ते हुए ऐतिहासिक निर्णय बताया. इन दोनों फैसलों का विपक्ष ने विरोध किया, जबकि बीजेपी ने इन्हें सांस्कृतिक विरासत की पुनर्स्थापना बताया.
योगी सरकार में जिले नहीं कस्बों पर भी फोकस!
योगी सरकार में सिर्फ जिलों के नहीं बल्कि तहसीलों और कस्बों के नाम भी बदले गए. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीते ही महीने अयोध्या जिले के भदरसा कस्बे का नाम बदलकर ‘भरत नगर’ रखने का ऐलान किया. इसी साल जुलाई 2026 में शाहजहांपुर जिले की जलालाबाद तहसील का नाम बदलकर ‘भगवान परशुराम पुरी’ किया गया. खिरौनी-सुचित्तागंज नगर पंचायत का नाम बदलकर ‘मां ज्वाला देवी’ रखने की घोषणा की गई.
जून 2026 में ही सीएम ने कुशीनगर जिले के फाजिलनगर का नाम बदलकर ‘पावागढ़’ करने का ऐलान किया. वहीं साल 2023 में गोरखपुर जिले की मुंडेरा बाजार नगर पंचायत का नाम बदलकर आधिकारिक तौर पर चौरी चौरा कर दिया. देवरिया जिले के बरहज तहसील स्थित ‘तेलिया अफगान’ गांव का नाम बदलकर तेलिया शुक्ल किया गया. साल 2019 में चंदौली जिले में तहसील का नाम बदलकर जनसंघ के नेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखा गया था.
अब फिर ‘संत रविदास नगर’ की वापसी की तैयारी
साल 2026 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास जयंती से जुड़े कार्यक्रम में घोषणा की कि भदोही जिले का नाम फिर से ‘संत रविदास नगर’ किया जाएगा.
हालांकि केवल मुख्यमंत्री की घोषणा से किसी जिले का नाम आधिकारिक रूप से नहीं बदल जाता. इसके लिए पहले राज्य सरकार को प्रस्ताव पारित करना होता है. इसके बाद प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा जाता है. गृह मंत्रालय विभिन्न विभागों से राय लेने के बाद अंतिम मंजूरी देता है. अधिसूचना जारी होने के बाद ही नया नाम आधिकारिक रूप से लागू होता है.
नाम बदलने की राजनीति क्यों?
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है. यहां जिलों, शहरों और सार्वजनिक संस्थानों के नाम केवल प्रशासनिक पहचान नहीं होते, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदेश का माध्यम भी बनते हैं.
बसपा ने दलित और बहुजन महापुरुषों के नाम पर जिलों का नामकरण कर अपने सामाजिक न्याय के एजेंडे को आगे बढ़ाया. समाजवादी पार्टी ने स्थानीय और ऐतिहासिक पहचान का हवाला देकर पुराने नाम बहाल किए. वहीं बीजेपी सरकार धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राचीन पहचान को आधार बनाकर नाम परिवर्तन के फैसले लेती रही है.
यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में जिलों के नाम बदलने का मुद्दा अक्सर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है. सरकारें बदलती हैं तो नाम बदलने की बहस भी नए सिरे से शुरू हो जाती है. भदोही को दोबारा ‘संत रविदास नगर’ बनाने की घोषणा ने एक बार फिर इसी बहस को केंद्र में ला खड़ा किया है.
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